क्या उपनाम होना जरुरी है ?

Tuesday, March 9, 2010

क्या उपनाम होना जरुरी है ?

मेरे इस ब्लॉग से शायद कुछ लोगों को आपति जरुर मेहसूस होगी मगर मेरा ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है, .मैं कोई पत्रकार नहीं हूँ और ना ही मैंने कोई पत्रिकारिता मैं कोई डिग्री हासिल की है.

आज भारत अपने आप मैं एक सम्रध देश बन चूका है यहाँ तरह तरह की संस्कृतियाँ, भाषाएँ,चल चलन, खान पान, और बहुत कुछ जिनका मैं विश्लेषण करना बहुत कठिन है

क्या हमने कभी सोचा है की हमारे अंदर एक कुरूति पनप रही है वो है जातिवादी विचारधारा. आज बड़े बड़े शहरों मैं लोगों को उनके नाम से कम उनके उपनाम से पुकारा जाता है चाहे वो सरकारी दफ्तर, सरकारी हस्पताल, बसों, ट्रेनों, स्कूल आदि ग्रामीण शहरों मैं तो आज भी उनकी बिरादरी ही को ही तब्ब्जुब दिया जाता है.ऐसा क्योएँ होता है कभी सोचा नहीं.

हम मैं से बहुत कम लोग हैं जो ये जानते है की स्वतंत्र भारत मैं बहुत साल पहले बाबू जगजीवन राम जो बहुत अच्छे स्वतंत्रता सेनानी थे उनका ये कहना था की अगर हिंदुस्तान मैं से जातिवाद विचारधारा को जड़ से अंत करना है तो जितने भी सरकारी कार्यों मैं, सरकारी स्कूलों ,अस्पताल, बैंकों, और सरकारी भार्तियों आदि मैं से जाति का विवरण वाला कोलम ही नहीं होना चाहिये तथा लोगों को उनके नाम के पीछे उपनाम को हटा देना चाहिए क्योंकि इंसान की पहचान सबसे पहले उसके उपनाम से होती है और उसके बाद उसकी जाति की पहचान है, मगर कुछ जाति के ठेकेदारों ने उनकी बात को दबाना ही सही समझा.

कुछ दिन पहले मैं भारतीय स्टेट बैंक गया मने वहां से अकाउंट ओपनिंग का एक फॉर्म लिया, मैं उसको भरने लगा सारा फॉर्म भर चूका था मगर अंत मैं मेरा पेन अचानक रुक गया, मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया, क्या जानना चाहेंगे शायद आप मैं से कुछ जानते भी होंगे की वो क्या था उस कोलम मैं लिखा था की आप अपनी जाति का विवरण देना बहुत लोग हैं जो अपनी जाती की विवरण देने से नहीं चुंकते हैं वो शान से भर भी देते हैं खेर मैंने तो अपनी पहचान दे दी उस कोलम मैं N/A लिख कर. मैं आपको इसका उदाहरण भी दे रहा हूँ, जिसका मैं आपको एक भारतीय स्टेट बैंक का अकाउंट ओपनिंग फॉर्म दिखा रहा हूँ






इससे ये इस बात का पता चलता है की हम लोग जातिवाद को बढावा देने मैं शामिल हैं, शामिल वो लोग भी हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल कर ली हो, इसका भी उदहारण देना चाहूँगा मैं ,बात करीब १५ दिन पहले की है जब मैं अपने घर से ऑफिस के लिए बस ली, बस मैं बहुत देर से किसी बात पर वार्तालाप हो रहा था उनमें से एक व्यक्ति अपने आप को सरकारी विवाग मैं उच्च पद अधिकारी बता रहा था और बात बात पर अपनी जाति की विवरण देने से भी नहीं चुकता था की हम भरद्वाजओं मैं तो एसा होता है वेसा होता है, मेरे साथ ही बेठे एक व्यक्ति भी बड़ी गहराई से सुन रहा था कह सकते हैं की पूरी बस ही सुन रही थी उनकी बातों को रोकते हे बोला की अंकल आप हर बात पर अपनी जाति का विवरण मत दीजिये तो बहुत अच्छा होगा, आप एक शिखित ब्यक्ति होते हुए भी एक अशिक्षित जेसी बातें कर रहे हैं, तो उन सज्जन को ये बात अछि नहीं लगी खेर मैं अपने साथ बेठे ब्यक्ति की बातों से पूरी तरह सहमत था, मेरा ये मानना है की आज भी लोगों के दिलो मैं वही विचारधारा बनी मोजूद है वो पहले थी. जब तक हम लोग अपनी मानसिक विचारधारा को बदलेंगे नहीं तब तक इसका अंत हो ही नहीं सकता है.